शोर जिहाद : लाउडस्पीकर से अज़ान पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगना चाहिए |

हाल के एक महत्वपूर्ण निर्णय में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह आदेश दिया कि लाउडस्पीकरों{ध्वनिवर्धक यंत्रों } से ‘अज़ान’ को रोक दिया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा हालांकि अज़ान मुस्लिम मजहब का एक अनिवार्य हिस्सा है, लेकिन लाउडस्पीकर मुस्लिम मजहब में अनिवार्य नहीं है। यह निर्णय सरकार के लिए इस ‘शोर जिहाद’ को खत्म करने का एक मार्ग खोलता है।

शोर जिहाद
पारम्परिक रूप से अज़ान मस्जिद की मीनारों से चिल्ला कर दी जाती है

अज़ान के कारण ध्वनि प्रदूषण

अज़ान के कारण ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा नया नहीं है। मध्यकाल में संत कबीर ने खुद को इन शब्दों में व्यक्त किया: –

“कंकर – पत्थर जोरि के मस्जिद लाई बनाय,
ता चढ़ि मुल्ला बाँग दे, का बहरा भया खुदाय ? “

यहाँ मुल्ला की अजान की तुलना मुर्गे की बाँग से की गयी है |

पाठकों को याद होगा कि सोनू निगम कुछ साल पहले एक विवाद के केंद्र में थे जब उन्होंने अजान के शोर के कारण आने वाली समस्याओं का उल्लेख किया था। उन्हें इस्लामवादियों ने बुरी तरह से निशाना बनाया और आखिरकार उन्हें अपनी जीवनरक्षा के लिए माफी मांगनी पड़ी।

हाल की करिश्मा भोंसले वाली घटना भी ध्यान देने योग्य है। उसने अपने घर पर होने वाले अजान के शोर पर आपत्ति जताई और इसे कम करने का आग्रह मस्जिद से किया | स्थानीय मुसलमानों और विधायक द्वारा उसे धमकी दी गई है। इस साहसी लड़की ने ट्विटर पर इस सबका वीडियो पोस्ट किया है । ओपइंडिया ने अपनी वेबसाइट पर इस प्रसंग को स्थान दिया है।

अज़ान क्या है?


अज़ान दिन के निर्धारित समय पर मुअज्जिन द्वारा नमाज़ के लिए मुसलमानों को बुलाने का तरीका है। मस्जिदों के पास रहने वाले लोग इसे दिन में 5 बार सुनते हैं।
नमाज़ का यह आह्वान केवल मुसलमानों के लिए है और अज़ान मुसलमानों को मस्जिद में एकत्र होने के लिए कहता है।

दिलचस्प बात यह है कि इस साल कुवैत ने अज़ान के शब्द बदल दिए हैं । “नमाज़ अदा के लिए आओ”, की जगह “अपने घरों में नमाज़ पढ़ो” या “जहाँ हो वहीं नमाज़ पढ़ो” कहा गया ताकि कोरोना महामारी के दौरान लोगों को मस्जिद आने से हतोत्साहित किया जा सके । भारत में यह परिवर्तन नहीं किया गया और इस दौरान मस्जिदों में जाने वाले मुसलमानों के दसियों वीडियो सामने आए।

मुख्य बात यह है कि अज़ान स्वयं अपरिवर्तनीय नहीं है और परिस्थितियों के अनुसार इसे बदला भी जा सकता है। इसी प्रकार नमाज़ मस्जिद में या सडकों पर पढ़ना भी अनिवार्य नहीं है |

मजहबी/आध्यात्मिक गतिविधि या शोर जिहाद?


मस्जिदों में लाउडस्पीकर के उपयोग के पक्षकार यह कह सकते हैं कि यह एक मजहबी या आध्यात्मिक मामला है और सरकार को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। मेरा तर्क यह है कि यह जिहाद का एक रूप है और मुसलमानों द्वारा अपना प्रभुत्व दिखलाने का एक तरीका है। मेरे ऐसा कहने के कारण हैं: –

  • जिहाद काफिरों / गैर-मुसलमानों पर प्रभुत्व के लिए एक युद्ध है। अज़ान इस कारण को आगे बढ़ाने का साधन है। इसे जम्मू और कश्मीर में साप्ताहिक शुक्रवार के पथराव में देखा जा सकता है।
  • अज़ान ईश्वर के रूप में केवल अल्लाह की वैधता और मुहम्मद के अंतिम पैगंबर होने की घोषणा करती है। यह 80% भारतीय आबादी के लिए स्वीकार्य सिद्धांत नहीं है। वास्तव में, यह अन्य धर्मों को झूठा घोषित करती है और अन्य धर्मों के लिए अपमानजनक है। तब भी गैर-मुस्लिमों को इसे दिन में 5 बार सुनना पड़ता है।
  • अज़ान के खिलाफ कोई भी विरोध हिंसक तरीके से शांत किया जाता है। अज़ान से लेकर हिंसा की धमकियों से होते हुए मजहबी हिंसा, जिहाद का ही अखंड अबाध क्रम है।

शोर जिहाद पर प्रतिबंध क्यों लगाया जाना चाहिए?

  • लाउडस्पीकर पर अजान 100% मुस्लिम देश में स्वीकार्य हो सकती है। भारत जैसे बहुसंख्यक हिंदू देश में, अज़ान का 80% आबादी से कोई संबंध नहीं है।
  • मुहम्मद के समय में भी लाउडस्पीकर नहीं थे। इस प्रकार, मजहब के पालन हेतु इसका उपयोग अनिवार्य नहीं है।
  • अन्य देशों में इस तरह के प्रतिबंध लगाने की मिसालें हैं। कई अन्य देशों में, ध्वनि की सीमाएं हैं। इसलिए, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निंदा की चिंता भी नहीं है।
  • मुसलमानो से प्रतियोगिता में अन्य धार्मिक समूहों ने भी लाउडस्पीकर स्थापित करना शुरू कर दिया है {हालांकि ये ज्यादातर बहुत कम उपयोग किए जाते हैं}। इससे ध्वनि प्रदूषण में वृद्धि हुई है।
  • पूरे भारत में दंगों के लिए, कश्मीर में नरसंहारों का आयोजन करने और राष्ट्र-विरोधी संदेशों का प्रचार करने के लिए मस्जिदों के लाउडस्पीकरों का इस्तेमाल करने के सैकड़ों प्रमाण हैं।
  • शोर जिहाद ध्वनि प्रदूषण पैदा करता है, जिसका छात्रों पर, आस-पास रहने वाले बीमार और बूढ़े लोगों पर, सोते हुए बच्चों आदि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • अब ऐसे विकल्प उपलब्ध हैं जो उन लोगों द्वारा उपयोग किए जा सकते हैं जो मस्जिदों में नमाज़ में शामिल होना चाहते हैं।

धार्मिक स्थानों पर लाउडस्पीकर के विकल्प


अब तक यह स्पष्ट होना चाहिए, कि मस्जिदों को ही नहीं, सभी धार्मिक स्थानों पर भी लाउडस्पीकरों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। मैंने मस्जिदों पर ध्यान केंद्रित किया है क्योंकि मुसलमान एक आम तौर पर हठी समुदाय है। इसे सुधारने के प्रयासों ने हमेशा रूढ़िवाद और ‘हलाल झूठ’ की दीवार पर दम तोड़ा है। नीचे ‘हलाल झूठ’ पर अंग्रेजी में मेरी पोस्ट पढ़ें।


निम्नलिखित विकल्प हैं, जो लाउडस्पीकर की आवश्यकता को दूर कर सकते हैं: –

  • प्रार्थना के समय जानने के लिए अलार्म घड़ियों का उपयोग करें। ये मुहम्मद के समय में उपलब्ध नहीं थीं, लेकिन अब व्यापक रूप से उपलब्ध हैं और सभी मोबाइल फोन का हिस्सा हैं।
  • कई ऐप हैं जो न केवल आपको नमाज़ के लिए समय बताएंगे, बल्कि आपको व्यक्तिगत रूप से अज़ान भी सुना देंगे।
  • इन दिनों लाइव स्ट्रीम करना बहुत आसान है। मस्जिदें इस सुविधा का उपयोग लोगों को प्रार्थना में शामिल करने के लिए कर सकती है।
  • ये गैर-मुसलमानों को अजान सुनने की परेशानी से बचाएंगे, जबकि यह सुनिश्चित करेंगे कि मुसलमानों को इससे लाभ मिलता रहे।

वास्तव में, मुएज्जिन चाहें तो मीनारों पर चढ़ कर, जोर जोर से चिल्लाकर{बकौल संत कबीर : बाँग देकर} आस-पास रहने वाले मुसलमानों को नमाज़ हेतु बुला सकते हैं। यह सभी को स्वीकार्य होगा क्योंकि यह एक प्राचीन प्रथा है और कुछ दूरी पर रहने वाले गैर-मुस्लिम लोगों को परेशान नहीं करेगा।

निष्कर्ष


यह महत्वपूर्ण है कि धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकरों पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। इस सम्बन्ध में सबसे बड़ी चुनौती मुसलमानों की तरफ से ही आएगी। इस संदर्भ में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय स्वागत योग्य है क्योंकि यह शोर जिहाद बंद करने के लिए ठोस कानूनी आधार देता है।

इन आदेशों का पालन करना यूपी सरकार का दायित्व है और केंद्रीय सरकार को भी प्रतिबंध को राष्ट्रीय स्तर पर लगाने का प्रयास करना चाहिए।

To read this post in English, click here.

अगर आपको यह लेख पसंद आया तो कृपया इस लेख को अधिक से अधिक शेयर करें। आप इसे फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप आदि पर साझा कर सकते हैं।

One Reply to “शोर जिहाद : लाउडस्पीकर से अज़ान पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगना चाहिए |”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *